निस्वार्थ सेवा की मिसाल: किरण कामदार की प्रेरणादायक कहानी
मुंबई के पास वसई में रहने वालीं 62 वर्षीय किरण कामदार हर दिन न केवल खुद के स्वास्थ्य से लड़ती हैं, बल्कि दूसरों की भूख भी मिटाती हैं। पार्किंसंस जैसी गंभीर बीमारी के बावजूद, वह रोज़ाना अपनी रसोई में 20 से 22 किलो खिचड़ी बनाती हैं और इसे ज़रूरतमंदों तक पहुँचाने के लिए अस्पताल जाती हैं। उनकी यह सेवा भावना लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई है।
सेवा की शुरुआत: कोरोना महामारी ने बदली ज़िंदगी
साल 2020 में जब कोरोना महामारी ने दुनिया को झकझोर दिया था, तब कई लोग घरों में कैद रहने को मजबूर हो गए। अस्पतालों में मरीज़ों की संख्या बढ़ गई और कई लोग भूखे रहने को विवश हो गए। ऐसे में किरण ने उनकी तकलीफों को महसूस किया और मदद करने की ठानी।
“मैं कुछ और नहीं कर सकती, लेकिन खिचड़ी तो बना सकती हूँ।” – किरण कामदार
यह सोचते हुए उन्होंने अपनी निस्वार्थ सेवा की शुरुआत की। उन्होंने पहले स्वास्थ्य विभाग, स्थानीय विधायक और मेयर कार्यालय से अनुमति ली, ताकि वे बिना किसी बाधा के अपनी सेवा जारी रख सकें। अनुमति मिलने के बाद उन्होंने रोज़ाना अपनी रसोई में खिचड़ी बनाना शुरू किया और खुद अस्पताल जाकर इसे ज़रूरतमंदों को बाँटने लगीं।
पार्किंसंस से संघर्ष और सेवा का जुनून
किरण खुद पार्किंसंस बीमारी से ग्रसित हैं, जिसके चलते उन्हें कई शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। उन्हें रोज़ाना ढेरों दवाइयाँ खानी पड़ती हैं, लेकिन यह बीमारी उनके सेवा के जज़्बे को रोक नहीं पाई। उनकी असली ताकत उनका दृढ़ संकल्प और दूसरों की मदद करने की इच्छा है।
खिचड़ी से भर रहा है सैकड़ों लोगों का पेट
किरण रोज़ सुबह जल्दी उठकर खिचड़ी बनाने की तैयारी करती हैं। उनके बनाए भोजन से हर दिन लगभग 100 लोगों का पेट भरता है। उनकी खिचड़ी सिर्फ एक साधारण भोजन नहीं, बल्कि प्यार और सेवा की मिसाल बन चुकी है। अस्पताल में भर्ती मरीज़, उनके परिजन और ज़रूरतमंद लोग उनके इस सेवा कार्य से लाभान्वित होते हैं।
समाज की सराहना और आगे का सफर
किरण कामदार के इस निस्वार्थ कार्य की चर्चा अब दूर-दूर तक हो रही है। कई सामाजिक संगठनों और स्थानीय प्रशासन ने भी उनके प्रयासों की सराहना की है। उन्होंने महामारी के बाद भी अपनी सेवा जारी रखी है और आगे भी इसे जारी रखने की इच्छा रखती हैं।
कैसे मदद कर सकते हैं आप?
अगर आप भी किरण कामदार के इस महान कार्य में योगदान देना चाहते हैं, तो आप भोजन सामग्री, आर्थिक सहायता या स्वयंसेवा के माध्यम से उनकी मदद कर सकते हैं। उनके जैसे लोग हमें यह सिखाते हैं कि सेवा के लिए केवल इच्छा शक्ति की आवश्यकता होती है, संसाधन तो किसी न किसी रूप में मिल ही जाते हैं।
निष्कर्ष: प्रेरणा की मिसाल हैं किरण कामदार
62 वर्षीय किरण कामदार ने यह साबित कर दिया कि सेवा भावना किसी भी उम्र या परिस्थिति की मोहताज नहीं होती। पार्किंसंस जैसी बीमारी के बावजूद, उनका यह निस्वार्थ प्रयास उन्हें समाज में एक मिसाल बनाता है। उनकी यह कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हम अपने स्तर पर समाज के लिए क्या कर सकते हैं।
सलाम है खिचड़ी वाली दादी के इस जुनून को!