भारतीय बास्केटबॉल के क्षेत्र में ‘सिंह सिस्टर्स’ का नाम गर्व से लिया जाता है, और इस समूह की सबसे छोटी सदस्य, प्रतिमा सिंह, अपनी प्रतिभा और समर्पण के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। उनकी कहानी प्रेरणादायक है, जो संघर्ष, मेहनत और सफलता की मिसाल पेश करती है।
प्रारंभिक जीवन और परिवारिक पृष्ठभूमि
6 फरवरी 1990 को वाराणसी के शिवपुर क्षेत्र में जन्मी प्रतिमा सिंह, एक ऐसे परिवार से आती हैं, जहां खेल विशेषकर बास्केटबॉल का गहरा संबंध है। उनकी चारों बहनें—प्रशांति, प्रियंका, दिव्या और आकांक्षा—भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की बास्केटबॉल खिलाड़ी हैं। इस परिवार को ‘बास्केटबॉल फैमिली’ के नाम से जाना जाता है, जिसने भारतीय बास्केटबॉल को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है।
शिक्षा और प्रारंभिक करियर
प्रतिमा ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा वाराणसी के रानी मुरार गर्ल्स इंटर कॉलेज से पूरी की, जहां खेलकूद को विशेष महत्व दिया जाता था। उन्होंने 2003 में 13 वर्ष की उम्र में बास्केटबॉल खेलना शुरू किया और जल्द ही अपनी प्रतिभा के बल पर सबका ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के इंद्रप्रस्थ महिला कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की, जहां वे कॉलेज टीम की कप्तान भी रहीं।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता
प्रतिमा की खेल प्रतिभा ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। उन्होंने कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट्स में भारत का प्रतिनिधित्व किया और टीम की महत्वपूर्ण सदस्य रहीं। उनकी खेल शैली, नेतृत्व क्षमता और मैदान पर उनकी ऊर्जा ने उन्हें एक उत्कृष्ट खिलाड़ी के रूप में स्थापित किया।
व्यक्तिगत जीवन
प्रतिमा की व्यक्तिगत जिंदगी भी चर्चा का विषय रही है, विशेषकर उनकी और भारतीय क्रिकेटर ईशांत शर्मा की प्रेम कहानी। दोनों की मुलाकात 2013 में एक टूर्नामेंट के दौरान हुई, जहां ईशांत मुख्य अतिथि थे। प्रतिमा उस मैच में चोट के कारण नहीं खेल रही थीं और स्कोरर की भूमिका में थीं। यहीं से दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई, जो आगे चलकर प्रेम में बदल गई। लगभग पांच साल के प्रेम संबंध के बाद, दोनों ने 10 दिसंबर 2016 को विवाह किया।
सिंह सिस्टर्स: भारतीय बास्केटबॉल की रीढ़
सिंह परिवार की पांचों बहनें—प्रशांति, प्रियंका, दिव्या, आकांक्षा और प्रतिमा—ने भारतीय बास्केटबॉल को नई दिशा दी है। इनकी मेहनत और समर्पण ने न केवल वाराणसी बल्कि पूरे देश में बास्केटबॉल को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इनकी कहानी इस बात का प्रमाण है कि समर्पण और जुनून के साथ किसी भी लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है।
निष्कर्ष
प्रतिमा सिंह की कहानी हमें यह सिखाती है कि चुनौतियों का सामना करते हुए, समर्पण और मेहनत से सफलता की ऊंचाइयों को छुआ जा सकता है। उनकी और उनकी बहनों की यात्रा भारतीय बास्केटबॉल के लिए प्रेरणास्त्रोत है, जो आने वाली पीढ़ियों को खेल के प्रति समर्पित होने के लिए प्रेरित करती है।