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राजिंदर जोहर: एक अदम्य साहस और सेवा की मिसाल

राजिंदर जोहर: एक अदम्य साहस और सेवा की मिसाल

राजिंदर जोहर का नाम भारतीय समाजसेवा के क्षेत्र में अद्वितीय स्थान रखता है। उनकी जीवन यात्रा संघर्ष, साहस और सेवा की एक प्रेरणादायक कहानी है, जो हमें यह सिखाती है कि विपरीत परिस्थितियों में भी मानव सेवा का मार्ग कैसे प्रशस्त किया जा सकता है।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

राजिंदर जोहर का जन्म 1946 में पंजाब के एक छोटे से गांव में हुआ था। उनका पालन-पोषण एक साधारण परिवार में हुआ, जहां शिक्षा का विशेष महत्व था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही स्कूल में प्राप्त की और आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री हासिल की। शिक्षा के प्रति उनकी लगन और समर्पण ने उन्हें समाज में एक सम्मानित स्थान दिलाया।

पेशेवर जीवन और दुर्भाग्यपूर्ण घटना

स्नातक के बाद, राजिंदर जोहर ने चिकित्सा क्षेत्र में अपना करियर शुरू किया। वह एक योग्य ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट के रूप में कार्यरत थे और अपने मरीजों की सेवा में समर्पित थे। हालांकि, 1986 में एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना ने उनके जीवन को पूरी तरह बदल दिया। दिल्ली में एक डकैती के दौरान, उन्हें गोली मार दी गई, जिससे उनकी गर्दन के नीचे का हिस्सा पूर्णतः लकवाग्रस्त हो गया। यह घटना उनके लिए और उनके परिवार के लिए एक बड़ा आघात थी, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।

पुनर्निर्माण और नवजीवन की शुरुआत

अपनी शारीरिक स्थिति के बावजूद, राजिंदर जोहर ने आत्मसमर्पण नहीं किया। उन्होंने अपनी मानसिक शक्ति को संबल बनाया और अपने जीवन को नए सिरे से जीने का निर्णय लिया। उन्होंने महसूस किया कि समाज में विकलांग व्यक्तियों के लिए जागरूकता और समर्थन की कमी है। इस कमी को पूरा करने के लिए, उन्होंने 1992 में ‘फैमिली ऑफ डिसेबल्ड’ (एफओडी) नामक एक गैर-सरकारी संगठन की स्थापना की। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य विकलांग व्यक्तियों को आत्मनिर्भर बनाना और उन्हें समाज की मुख्यधारा में शामिल करना था।

‘फैमिली ऑफ डिसेबल्ड’ की उपलब्धियां

एफओडी के माध्यम से, राजिंदर जोहर ने विकलांग व्यक्तियों के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए। इन कार्यक्रमों में कौशल विकास, शिक्षा, रोजगार और पुनर्वास शामिल थे। उन्होंने ‘अपंग चित्रकला गैलरी’ की स्थापना की, जहां विकलांग कलाकारों की कलाकृतियों का प्रदर्शन और बिक्री की जाती थी, जिससे उनकी आर्थिक स्वतंत्रता में सहायता मिली। इसके अलावा, एफओडी ने ‘स्वावलंबन’ कार्यक्रम के तहत विकलांग व्यक्तियों को स्वरोजगार के लिए प्रोत्साहित किया।

व्यक्तिगत जीवन और साहित्यिक योगदान

राजिंदर जोहर न केवल एक समाजसेवी थे, बल्कि एक प्रतिभाशाली लेखक और संपादक भी थे। उन्होंने ‘द डिसेबल्ड न्यूज़ एंड व्यूज़’ नामक एक त्रैमासिक पत्रिका का संपादन किया, जो विकलांगता से संबंधित मुद्दों पर केंद्रित थी। इस पत्रिका के माध्यम से उन्होंने विकलांग व्यक्तियों की समस्याओं, उपलब्धियों और अधिकारों के बारे में जागरूकता फैलाई। उनकी लेखनी ने समाज में विकलांग व्यक्तियों के प्रति दृष्टिकोण बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सम्मान और पुरस्कार

राजिंदर जोहर के अथक प्रयासों और समाजसेवा के प्रति समर्पण के लिए उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उनमें से प्रमुख हैं:

  • राष्ट्रीय पुरस्कार: भारत सरकार द्वारा विकलांग व्यक्तियों के सशक्तिकरण के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए।
  • इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी अवार्ड: समाजसेवा में उल्लेखनीय योगदान के लिए।
  • लायंस क्लब इंटरनेशनल अवार्ड: विकलांग व्यक्तियों के उत्थान के लिए किए गए कार्यों के लिए।

निधन और विरासत

20 मार्च 2014 को राजिंदर जोहर का निधन हो गया, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि कैसे विपरीत परिस्थितियों में भी आत्मविश्वास, साहस और सेवा की भावना के साथ आगे बढ़ा जा सकता है। एफओडी आज भी उनकी बेटी प्रिया जोहर के नेतृत्व में सक्रिय है, जो अपने पिता के सपनों को साकार करने में जुटी हैं।

निष्कर्ष

राजिंदर जोहर का जीवन एक प्रेरणा स्रोत है, जो हमें यह सिखाता है कि शारीरिक सीमाएं हमारे आत्मबल और सेवा की भावना को नहीं रोक सकतीं। उनकी कहानी हमें यह संदेश देती है कि समाज में बदलाव लाने के लिए एक व्यक्ति का संकल्प और समर्पण कितना महत्वपूर्ण हो सकता है। उनकी दृष्टि और कार्य हमें प्रेरित करते हैं कि हम भी समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझें और उसे बेहतर बनाने में अपना योगदान दें।

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