Friday, April 4, 2025
No menu items!
spot_img
HomeIndia Waaleरमाबाई भीमराव आंबेडकर: त्याग, समर्पण और संघर्ष की प्रतिमूर्ति

रमाबाई भीमराव आंबेडकर: त्याग, समर्पण और संघर्ष की प्रतिमूर्ति

भारतीय समाज सुधारक और संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर के जीवन में उनकी पत्नी रमाबाई आंबेडकर का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण था। उनका जीवन त्याग, समर्पण और संघर्ष की मिसाल है, जिसने डॉ. आंबेडकर के सामाजिक और शैक्षणिक अभियानों में मौन समर्थन प्रदान किया।

प्रारंभिक जीवन

7 फरवरी 1898 को महाराष्ट्र के वणंद गांव में एक गरीब दलित परिवार में जन्मीं रमाबाई के पिता का नाम भीकू धुत्रे (वलंगकर) और माता का नाम रुक्मिणी था। उनके पिता मछली पकड़ने का काम करते थे, जिससे परिवार का गुजर-बसर होता था। माता-पिता के असामयिक निधन के बाद, रमाबाई और उनके भाई-बहनों का पालन-पोषण उनके चाचा और मामा ने किया। citeturn0search0

विवाह और पारिवारिक जीवन

1906 में, मात्र 9 वर्ष की आयु में, रमाबाई का विवाह 14 वर्षीय भीमराव आंबेडकर से हुआ, जो उस समय पांचवीं कक्षा के छात्र थे। विवाह के बाद, उन्होंने अपने पति को ‘साहेब’ कहकर संबोधित किया, जबकि डॉ. आंबेडकर उन्हें प्रेमपूर्वक ‘रामू’ कहते थे। उनके परिवार में पांच संताने हुईं, लेकिन आर्थिक तंगी और स्वास्थ्य समस्याओं के कारण केवल यशवंत आंबेडकर ही जीवित रहे। citeturn0search1

संघर्ष और त्याग

डॉ. आंबेडकर की उच्च शिक्षा के लिए विदेश यात्रा के दौरान, रमाबाई ने परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों को संभाला। उन्होंने उपले बनाकर बेचे और दूसरों के घरों में काम किया ताकि घर का खर्च चल सके। अपने बच्चों की मृत्यु के बावजूद, उन्होंने धैर्य नहीं खोया और अपने पति के सपनों को साकार करने में सहयोग करती रहीं। citeturn0search4

धार्मिक आस्था और सामाजिक प्रतिबद्धता

रमाबाई धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं और पंढरपुर के विट्ठल-रुक्मिणी मंदिर में जाना चाहती थीं। लेकिन उस समय दलितों के प्रवेश पर प्रतिबंध था। डॉ. आंबेडकर ने उन्हें समझाया कि वे एक ऐसा मंदिर बनाएंगे जहां सभी को प्रवेश की अनुमति होगी। यह उनकी समतामूलक समाज की परिकल्पना का हिस्सा था। citeturn0search4

स्वास्थ्य समस्याएं और निधन

लगातार संघर्ष और कठिन परिस्थितियों के कारण, रमाबाई का स्वास्थ्य प्रभावित हुआ। डॉ. आंबेडकर ने उनके इलाज के लिए हर संभव प्रयास किया, लेकिन 27 मई 1935 को, 37 वर्ष की आयु में, उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु ने डॉ. आंबेडकर को गहरे शोक में डाल दिया, लेकिन उन्होंने अपने सामाजिक सुधार के कार्य को जारी रखा। citeturn0search0

निष्कर्ष

रमाबाई आंबेडकर का जीवन त्याग, समर्पण और संघर्ष की कहानी है। उन्होंने न केवल अपने परिवार का पालन-पोषण किया, बल्कि डॉ. आंबेडकर के सामाजिक अभियानों में मौन समर्थन प्रदान किया। उनका जीवन हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य और समर्पण से कैसे आगे बढ़ा जा सकता है।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -spot_img
- Advertisment -spot_img
- Advertisment -spot_img

Most Popular

Recent Comments